
बच्चे को एक जगह बैठाने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना आसान तरीका लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ा सकती है। लगातार मोबाइल देखने से बच्चा खेलकूद, परिवार के साथ बातचीत और दूसरी गतिविधियों में कम रुचि लेने लग सकता है। कुछ बच्चों में स्क्रीन बंद करने पर चिड़चिड़ापन या गुस्सा भी दिखाई दे सकता है।
बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करते समय उनकी उम्र और जरूरत को ध्यान में रखना जरूरी है। मोबाइल को बच्चे को शांत कराने का नियमित साधन बनाने के बजाय कहानी सुनाना, किताब पढ़ना, आउटडोर गेम्स, ड्राइंग या दूसरे रचनात्मक कामों में व्यस्त किया जा सकता है। अगर बच्चे के व्यवहार, नींद, पढ़ाई या रोजमर्रा की गतिविधियों में लगातार बदलाव दिखाई दे, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
बच्चों में ज्यादा स्क्रीन टाइम का असर सिर्फ उनके व्यवहार तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक मोबाइल देखने से उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो सकती हैं और सोने-जागने की दिनचर्या भी प्रभावित हो सकती है। खासतौर पर रात में मोबाइल या अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल करने से बच्चे के सोने के समय में बदलाव आ सकता है। इसलिए माता-पिता को बच्चे की उम्र के हिसाब से स्क्रीन के इस्तेमाल की स्पष्ट सीमा तय करनी चाहिए।
कई बार बच्चा मोबाइल देखने का आदी हो जाता है और फोन हटाते ही रोने, गुस्सा करने या जिद करने लगता है। ऐसे में अचानक मोबाइल पूरी तरह बंद करने के बजाय धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम करना बेहतर तरीका हो सकता है। माता-पिता खुद भी मोबाइल का सीमित इस्तेमाल करके बच्चे के सामने अच्छा उदाहरण पेश कर सकते हैं।
बच्चे को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल के बजाय ऐसी गतिविधियां चुनें जिनमें वह सक्रिय रूप से हिस्सा ले सके। पजल, रंग भरना, कहानी की किताबें, ब्लॉक्स, आउटडोर खेल और परिवार के साथ बातचीत जैसे विकल्प बच्चे के समय को ज्यादा रचनात्मक बना सकते हैं। अगर बच्चे के व्यवहार में अचानक और लगातार बदलाव नजर आए, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।



