लाइफस्टाइल
‘मेरी पहली दुश्मन मेरी मां थीं’ बेटी की बात से लें पेरेंटिंग सीख
बचपन में माता-पिता का व्यवहार बच्चे की सोच और व्यक्तित्व पर गहरा असर डाल सकता है। एक बेटी की यह बात कि ‘मेरी पहली दुश्मन मेरी मां थीं’ उन बच्चों की भावनाओं को सामने लाती है, जो बचपन में अपने माता-पिता से भावनात्मक दूरी महसूस करते रहे हैं। कई बार माता-पिता बच्चों की भलाई के लिए सख्ती करते हैं, लेकिन बच्चे उस व्यवहार को दबाव या अस्वीकार किए जाने के रूप में महसूस कर सकते हैं।
बच्चों की हर गलती पर डांटना, उनकी तुलना दूसरे बच्चों से करना या उनकी बात सुने बिना लगातार अपनी अपेक्षाएं थोपना उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर जब बच्चे अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहते हों और उन्हें बार-बार चुप करा दिया जाए, तो वे धीरे-धीरे अपनी परेशानियां साझा करना बंद कर सकते हैं।
पेरेंट्स के लिए जरूरी है कि वे बच्चों को अनुशासन सिखाने के साथ उनकी बात भी सुनें। बच्चे की गलती पर सिर्फ सजा देने के बजाय यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया। उम्र के अनुसार उन्हें फैसलों में छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना और उनकी कोशिशों की सराहना करना भी आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद कर सकता है।
हर माता-पिता से गलतियां हो सकती हैं और हर बच्चे का अनुभव भी अलग होता है। जरूरी यह है कि माता-पिता समय-समय पर अपने व्यवहार पर विचार करें और जरूरत पड़ने पर उसमें बदलाव लाएं। बच्चों के साथ खुला संवाद, सम्मान और भावनात्मक सुरक्षा का माहौल परिवार के रिश्ते को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।