SHANTI Act पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मुआवजे को लेकर केंद्र से सवाल

परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा कि क्या SHANTI Act के तहत दायित्व की सीमा तय होने के बाद भी संवैधानिक अदालतें पीड़ितों के लिए उचित और न्यायसंगत मुआवजा तय कर सकती हैं।
यह मामला SHANTI Act, 2025 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। पूर्व नौकरशाह ईएएस शर्मा समेत प्रोफेसरों और वैज्ञानिकों के एक समूह ने कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कुछ प्रावधान मौलिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े करते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने परमाणु दुर्घटना की गंभीरता का मुद्दा उठाया। उनका तर्क है कि किसी बड़े परमाणु हादसे में होने वाला वास्तविक नुकसान कानून में निर्धारित मुआवजा सीमा से कई गुना अधिक हो सकता है। उन्होंने चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसे हादसों का उदाहरण भी अदालत के सामने रखा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर ध्यान दिया कि संसद द्वारा दायित्व की सीमा तय किए जाने का मतलब क्या यह है कि अदालतें उससे अधिक उचित मुआवजा देने में असमर्थ हो जाएंगी। अदालत की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि पीड़ितों के अधिकार और वैधानिक मुआवजा सीमा के बीच संतुलन का मुद्दा सुनवाई में महत्वपूर्ण रहेगा।
SHANTI Act के तहत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी का रास्ता भी खोला गया है और परमाणु दायित्व व्यवस्था में बदलाव किए गए हैं। इसी वजह से कानून में ऑपरेटर की जवाबदेही, आपूर्तिकर्ताओं की जिम्मेदारी और पीड़ितों के मुआवजे को लेकर बहस महत्वपूर्ण हो गई है। मामले में परमाणु नियामक व्यवस्था की स्वतंत्रता का सवाल भी सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने Atomic Energy Regulatory Board यानी AERB के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी केंद्र से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नियुक्ति प्रक्रिया में Atomic Energy Commission की भूमिका नियामक की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
मुआवजे की सीमा को लेकर भी याचिका में गंभीर चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार बड़े परमाणु हादसे से होने वाला आर्थिक और मानवीय नुकसान तय वैधानिक सीमा से बहुत अधिक हो सकता है। ऐसे में दुर्घटना के पीड़ितों को पर्याप्त राहत कैसे मिलेगी, यह मामले का प्रमुख सवाल बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीमित मुद्दों पर केंद्र सरकार और AERB को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत के सामने अब यह स्पष्ट करना होगा कि SHANTI Act की दायित्व सीमा संवैधानिक अदालतों की न्यायिक शक्तियों को किस हद तक प्रभावित करती है।
इस मामले का फैसला भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए दूरगामी महत्व रख सकता है। एक ओर सरकार परमाणु ऊर्जा उत्पादन में निजी निवेश और विस्तार को बढ़ावा देना चाहती है, वहीं दूसरी ओर परमाणु हादसे की स्थिति में नागरिकों की सुरक्षा और पर्याप्त मुआवजे की गारंटी भी अहम है। सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई से इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण दिशा मिल सकती है।



