सेंगोल बनाने वाले वुम्मिडी एथिराज का निधन, 99 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

वुम्मिडी एथिराज तमिलनाडु के प्रतिष्ठित जौहरी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनका परिवार करीब 125 साल पुराने वुम्मिडी बंगारू ज्वेलर्स से जुड़ा है। एथिराज ने पारंपरिक आभूषण निर्माण और शिल्पकला के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। ऐतिहासिक सेंगोल के निर्माण में उनकी भूमिका ने उन्हें देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहचान दिलाई। उनके निधन से पारंपरिक शिल्पकला की दुनिया ने एक अनुभवी कारीगर खो दिया है।
पीएम मोदी ने जताया दुख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वुम्मिडी एथिराज के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एथिराज को ऐतिहासिक सेंगोल के निर्माण में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने यह भी याद किया कि वर्ष 2023 में नए संसद भवन में सेंगोल को सम्मानजनक स्थान दिए जाने के अवसर पर उनकी एथिराज से मुलाकात हुई थी। मोदी ने उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति ने भी दी श्रद्धांजलि
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एथिराज के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि सेंगोल के निर्माण में उनकी कला ने उन्हें भारत की सभ्यतागत विरासत में स्थायी स्थान दिलाया है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी उनके योगदान को सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद किया। उनके संदेशों में पारंपरिक भारतीय शिल्पकला और देश के ऐतिहासिक प्रतीकों के निर्माण में कारीगरों की भूमिका को रेखांकित किया गया।
1947 में सेंगोल का निर्माण और नेहरू को सौंपे जाने का इतिहास
सेंगोल एक राजदंड है, जिसे सोने की परत चढ़ी चांदी से तैयार किया गया था। इसका निर्माण स्वतंत्रता के समय हुआ था। 14 अगस्त 1947 की रात तमिलनाडु के तिरुवावडुथुराई अधीनम के संतों ने इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था। सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण और न्यायपूर्ण शासन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसके निर्माण में वुम्मिडी ज्वेलर्स की भूमिका रही थी।
2023 में नए संसद भवन में मिला विशेष स्थान
28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेंगोल को लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी के पास स्थापित किया। इसके बाद यह ऐतिहासिक वस्तु देश की राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत को लेकर चर्चा का प्रमुख विषय बनी। सेंगोल के निर्माण से जुड़े कारीगरों के योगदान को भी इस दौरान व्यापक पहचान मिली। वुम्मिडी एथिराज का नाम इसी ऐतिहासिक धरोहर से जुड़ा रहेगा।
भारतीय पारंपरिक शिल्पकला की विरासत में योगदान
वुम्मिडी एथिराज का जीवन पारंपरिक आभूषण निर्माण और भारतीय शिल्पकला की निरंतरता का उदाहरण रहा। सेंगोल जैसे ऐतिहासिक प्रतीक के निर्माण में उनकी भूमिका ने कारीगरों के हुनर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उनके निधन पर देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा व्यक्त किया गया शोक इस योगदान के महत्व को दर्शाता है। उनका काम भारतीय कला और इतिहास से जुड़े प्रसंगों में लंबे समय तक याद किया जाएगा।



