पर्युषण पर्व क्यों मनाया जाता है? जानिए जैन धर्म के सबसे बड़े उत्सव का महत्व

पर्युषण पर्व जैन धर्म का एक प्रमुख और पवित्र धार्मिक उत्सव है। इसे आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व माना जाता है। इस दौरान जैन समाज के लोग अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों का आत्ममंथन करते हैं तथा जीवन में अहिंसा और सदाचार अपनाने का संकल्प लेते हैं।
पर्युषण का अर्थ होता है ‘निकट आना’ या ‘आत्मा के करीब जाना’। जैन मान्यताओं के अनुसार, यह पर्व व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया से दूर होकर अपनी आत्मा की शुद्धि और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
इस पर्व के दौरान जैन अनुयायी उपवास, ध्यान, पूजा-पाठ और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। कई श्रद्धालु कठिन तपस्या भी करते हैं और अपने मन, वचन तथा कर्मों को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं।
पर्युषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्षमा और करुणा है। इसके समापन पर मनाया जाने वाला क्षमावाणी दिवस विशेष महत्व रखता है, जिसमें लोग एक-दूसरे से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और सभी के प्रति मैत्री भाव रखने का संकल्प लेते हैं।
जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर समुदाय इस पर्व को अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाते हैं। श्वेतांबर समुदाय में यह आमतौर पर आठ दिनों तक और दिगंबर समुदाय में इसे दशलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है।
पर्युषण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण, अहिंसा, संयम और क्षमा जैसे जीवन मूल्यों को अपनाने का संदेश देता है। यही कारण है कि इसे जैन धर्म के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण पर्वों में शामिल किया जाता है।



