देहरादून की 157 साल पुरानी रामलीला, मुस्लिम समाज भी भागीदार

देहरादून की ऐतिहासिक रामलीला की शुरुआत सहारनपुर के देवबंद से आए लाला जमुनादास ‘भक्त’ ने की थी। श्री गुरु राम राय दरबार साहिब के तत्कालीन महंत श्री नारायण दास के संरक्षण में रामलीला बाजार स्थित श्रीरामलीला भवन में मंचन शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह आयोजन शहर की सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
शुरुआती दौर में रामलीला का मंचन तुलसीदास की रामचरितमानस की चौपाइयों के माध्यम से किया जाता था। बाद में लाला जमुनादास ‘भक्त’ ने तुलसीकृत और अपनी रचित चौपाइयों को मिलाकर ‘लीला रामायण’ तैयार की। समय के साथ इसमें संवाद और नाट्य शैली भी शामिल हुई, जिससे मंचन का स्वरूप बदलता गया।
देहरादून की रामलीला की खास बात यह भी है कि इसकी शोभायात्राओं में मुस्लिम समाज के लोगों की भागीदारी लंबे समय से रही है। स्वर्गीय मास्टर अल्ताफ हुसैन के पिता शोभायात्रा में निश्शुल्क बैंड बजाया करते थे। बाद में मास्टर अल्ताफ ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आज भी अल्ताफ जनता ब्रास बैंड समिति की शोभायात्रा में अपनी सेवाएं देती है।
रामलीला के साथ लंका दहन की परंपरा भी समय के साथ अलग-अलग स्थानों पर आयोजित होती रही है। पहले श्री दरबार साहिब परिसर के तालाब के पास लंका दहन होता था। वर्ष 2020 में वहां आखिरी बार आयोजन हुआ, जिसके बाद अब लक्ष्मण चौक स्थित हिंदू नेशनल स्कूल के मैदान में लंका दहन किया जाता है।
रामलीला समिति की जिम्मेदारी भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। पहले साधुराम महेंद्रू और फिर उनके बेटे भगवत स्वरूप महेंद्रू ने समिति की अध्यक्षता संभाली। पिछले करीब 12 वर्षों से राकेश स्वरूप महेंद्रू इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह आयोजन देहरादून के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता को दर्शाता है।



