लद्दाख के ग्लेशियर तेजी से सिमटे, छोटे ग्लेशियरों पर ज्यादा असर

पश्चिमी हिमालय के लद्दाख क्षेत्र में ग्लेशियरों का पीछे हटना और बर्फ के भंडार में कमी आना चिंता का विषय बन रहा है। डोडा नदी बेसिन में किए गए अध्ययन में पाया गया कि पिछले वर्षों के दौरान ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में गिरावट आई है। छोटे ग्लेशियर इस बदलाव से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हुए हैं।
छोटे ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में 12.9% की कमी
अध्ययन में शामिल 25 ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल वर्ष 2005 में करीब 346 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर लगभग 343 वर्ग किलोमीटर रह गया। पांच वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में करीब 12.9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। वहीं, पांच से 10 वर्ग किलोमीटर आकार वाले मध्यम ग्लेशियरों में लगभग 3.8 प्रतिशत और 10 वर्ग किलोमीटर से बड़े ग्लेशियरों में करीब 1.2 प्रतिशत की गिरावट सामने आई।
ग्लेशियरों की सतही गति भी हुई धीमी
वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों के क्षेत्रफल के साथ उनकी सतही गति में आए बदलाव का भी आकलन किया। अध्ययन में वर्ष 1999-2000 और 2022-2023 की अवधि की तुलना करने पर बड़े ग्लेशियरों की औसत सतही गति में करीब 44.5 प्रतिशत और मध्यम आकार के ग्लेशियरों में लगभग 33 प्रतिशत की गिरावट पाई गई। यह बदलाव ग्लेशियरों की संरचना और उनकी गतिशीलता में हो रहे परिवर्तन की ओर संकेत करता है।
जल उपलब्धता पर पड़ सकता है असर
लद्दाख जैसे ठंडे और शुष्क क्षेत्र में ग्लेशियरों से पिघलने वाला पानी स्थानीय जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण है। ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, मोटाई और गति में लगातार बदलाव होने से भविष्य में पानी की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है। इसका असर स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और उन समुदायों पर भी पड़ सकता है जो जल संसाधनों पर निर्भर हैं।
ग्लेशियरों की निगरानी जरूरी
विशेषज्ञों के लिए ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है। उपग्रह तस्वीरों, क्षेत्रीय सर्वेक्षणों और वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, बर्फ की मोटाई तथा सतही गति का आकलन किया जा सकता है। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और भविष्य में जल संसाधनों से जुड़ी चुनौतियों की बेहतर तैयारी करने में मदद मिल सकती है।



