73 साल से गीता प्रेस से जुड़े रहे बैजनाथ अग्रवाल, दुनिया भर में दिलाई नयी पहचान

गीता प्रेस ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे केशोराम अग्रवाल के बाद बैजनाथ अग्रवाल दूसरे सबसे वरिष्ठ ट्रस्टी थे। इतने वरिष्ठ होने के बाद भी उन्होंने कभी भी कोई पद नहीं लिया, सिर्फ सदस्य ट्रस्टी के रूप में सेवा कार्य करते रहे। उनका मानना था कि उन्हें सिर्फ गीता प्रेस की सेवा करनी है, इसके लिए कोई पद जरूरी नहीं है।

गीता प्रेस को दुनियाभर में पहचान दिलाने में ट्रस्टी रहे समाजसेवी बैजनाथ अग्रवाल ने बड़ी भूमिका निभाई। वे गीता प्रेस के 100 वर्षों के इतिहास में 73 वर्षों से जुड़कर सेवा कार्य करते रहे। इतने लंबे कार्यकाल में वह करीब 35 वर्ष तक गीता प्रेस के प्रबंधक रहे। गीता प्रेस को आधुनिक बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। उनके कार्यकाल में ही लेटर प्रेस को ऑफसेट प्रेस में बदला गया। इसके साथ ही गीता प्रेस में रंगीन पुस्तकों की छपाई का कार्य भी इन्हीं की देखरेख में शुरू हुआ।

जब गीता प्रेस के पुस्तकों की मांग दुनियाभर में बढ़ने लगी तो बैजनाथ अग्रवाल ने छपाई की आधुनिक मशीन कोमोरी, बाइंडिंग मशीन सहित कई मशीनें विदेशों से मंगाई। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक गीता प्रेस की पुस्तकें पहुंच सके। नेपाल में स्थित गीता प्रेस का एक मात्र अंतरराष्ट्रीय केंद्र की स्थापना बैजनाथ अग्रवाल की पहल पर ही हुई।

मूलरूप से हरियाणा के भिवानी शहर के रहने वाले लाला लालचंद अग्रवाल गीता प्रेस में कर्मचारी थे। उनके पुत्र बैजनाथ अग्रवाल भी पिता के साथ गीता प्रेस आया करते थे। ईश्वरीय सेवा के उद्देश्य से बैजनाथ अग्रवाल 1950 में महज 17 वर्ष की आयु में गीता प्रेस से जुड़ गए। गीता प्रेस में सहायक के रूप में उन्होंने काम की शुरुआत की। इसके बाद वह पेपर एजेंसी का कार्यभार देखने लगे। जब पेपर एजेंसी का काम बंद हो गया तो उन्होंने प्रबंधक के रूप में गीता प्रेस का काम देखना शुरू कर दिया।

नियमित आते थे गीता प्रेस
बैजनाथ अग्रवाल करीब 40 वर्षों तक गीता प्रेस के ट्रस्टी रहे। अपने कार्यकाल में वह नियमित गीता प्रेस आते थे। निधन के एक सप्ताह पहले तक वह अपने पुत्र व गीता प्रेस के ट्रस्टी देवीदयाल अग्रवाल के साथ गीता प्रेस आते रहे। वह गीता प्रेस के सभी कर्मचारियों को अपने पुत्र के समान मानते थे, चाहे छोटा हो या बड़ा सबकी बात सुनते थे। गीता प्रेस के कर्मचारी भी उन्हें अपना अभिभावक मानते थे। किसी भी बड़ी समस्या का समाधान वह आसानी से कर देते थे।

दो राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में हुए शामिल
1950 में बैजनाथ अग्रवाल गीता प्रेस से जुड़े। 29 अप्रैल 1955 को देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद गीता प्रेस

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