Power Crisis: हाइड्रोपावर उत्पादन 12% घटा, बिजली संकट का क्यों बढ़ा खतरा?

भारत में बिजली की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है, लेकिन जलविद्युत उत्पादन में गिरावट ने पावर सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है। कमजोर मॉनसून और El Niño के असर से जलाशयों और नदियों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स से बिजली उत्पादन पर पड़ा है।
पावर मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक 29 अगस्त तक हाइड्रोपावर उत्पादन में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 12 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह लगातार चौथा महीना है जब जलविद्युत उत्पादन दबाव में बना हुआ है।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह कमजोर बारिश मानी जा रही है। अगस्त में देश में बारिश सामान्य से 16 प्रतिशत से ज्यादा कम रही। इससे कई जलाशयों में पानी का स्तर और नदियों का प्रवाह प्रभावित हुआ, जिससे हाइड्रो प्लांट्स की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा।
El Niño की स्थिति ने समस्या को और बढ़ाया है। मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण मॉनसून कमजोर रहने से बारिश पर निर्भर हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। सितंबर में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान है, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा।
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ बिजली की सप्लाई पर दबाव है, वहीं दूसरी तरफ मांग भी कम होने का नाम नहीं ले रही। गर्म मौसम के कारण एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। किसानों की सिंचाई जरूरत ने भी बिजली की खपत को बढ़ाया है।
जुलाई 2026 में देश की बिजली मांग करीब 171 बिलियन यूनिट तक पहुंच गई थी, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 10.9 प्रतिशत ज्यादा थी। इसी दौरान पीक पावर डिमांड करीब 270 गीगावाट तक पहुंच गई।
हाइड्रोपावर में कमी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जलविद्युत ग्रिड के लिए सिर्फ बिजली का एक स्रोत नहीं है, बल्कि मांग में अचानक बदलाव आने पर इसे अपेक्षाकृत तेजी से इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में हाइड्रो उत्पादन कम होने पर ग्रिड बैलेंसिंग की चुनौती बढ़ जाती है।
हाइड्रो की कमी को पूरा करने के लिए थर्मल पावर पर निर्भरता बढ़ सकती है। लेकिन कोयला आधारित बिजली संयंत्र भी पूरी तरह आराम की स्थिति में नहीं हैं। 25 अगस्त तक देश के 45 कोयला आधारित पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक गंभीर रूप से कम बताया गया था।
बिजली संकट का एक और अहम पहलू शाम का समय है। दिन में सोलर पावर से बड़ी मात्रा में बिजली मिलती है, लेकिन सूरज ढलने के बाद सोलर उत्पादन तेजी से कम हो जाता है। इसी समय घरेलू और व्यावसायिक बिजली मांग ऊंची रह सकती है, जिससे शाम के समय सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून 2026 के बीच पीक बिजली मांग में सालाना आधार पर करीब 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जून में गैर-सोलर घंटों के दौरान पीक डिमांड और उपलब्ध सप्लाई के बीच करीब 3,045 मेगावाट का अंतर भी दर्ज किया गया था।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि देश में तत्काल बड़े पैमाने पर बिजली संकट शुरू हो गया है। सरकार के अनुसार जून 2026 तक भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 548.86 गीगावाट थी। चुनौती मुख्य रूप से यह है कि अलग-अलग समय पर उपलब्ध बिजली और मांग के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
कुल मिलाकर, कमजोर मॉनसून, El Niño, घटता हाइड्रो उत्पादन और मजबूत बिजली मांग ने भारत के ऊर्जा क्षेत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अगर सितंबर में भी बारिश उम्मीद से कम रहती है, तो जलाशयों की स्थिति और हाइड्रो उत्पादन पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में कोयला, गैस, सोलर, स्टोरेज और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर के बेहतर प्रबंधन की भूमिका आने वाले महीनों में और अहम हो जाएगी।



