Uday Kotak Warning: जापान की बॉन्ड यील्ड 30 साल के हाई पर, भारत पर क्या होगा असर?

दुनिया के बॉन्ड बाजार में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जापान की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 3 प्रतिशत के पार पहुंच गई है। यह करीब तीन दशक में पहली बार हुआ है और इससे ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में हलचल बढ़ गई है।
जापान की 10-year बॉन्ड यील्ड 3% के ऊपर पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक जापान बेहद कम ब्याज दरों के दौर के लिए जाना जाता रहा है। अब महंगाई, कमजोर येन और बढ़ते सरकारी खर्च ने वहां ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें बदल दी हैं।
इसी घटनाक्रम पर दिग्गज बैंकर उदय कोटक ने निवेशकों को सतर्क किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि जापान की 10-year यील्ड 3% और अमेरिका की 10-year यील्ड 4.8% के आसपास पहुंच रही है। उनके मुताबिक ब्याज दरों के बाजार में आने वाला दौर ‘रोलर कोस्टर’ जैसा हो सकता है।
कोटक की चिंता की बड़ी वजह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़ता कर्ज और राजकोषीय घाटा है। उनका मानना है कि अगर सरकारी कर्ज और घाटे का दबाव बढ़ता रहा, तो केंद्रीय बैंकों को अपनी बैलेंस शीट बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। इससे महंगाई और छोटी अवधि की ब्याज दरों पर दबाव बढ़ सकता है।
जापान में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर सिर्फ वहां तक सीमित नहीं रह सकता। जापानी निवेशक लंबे समय से विदेशों में बॉन्ड और दूसरी परिसंपत्तियों में निवेश करते रहे हैं। घरेलू बॉन्ड से ज्यादा रिटर्न मिलने पर उनके लिए पैसा जापान में रखना अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकता है।
यही बदलाव भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए महत्वपूर्ण है। अगर जापान और अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो वैश्विक निवेशकों के लिए वहां पैसा लगाना ज्यादा आकर्षक हो सकता है। इससे भारत जैसे बाजारों से विदेशी पूंजी के बाहर निकलने का दबाव बढ़ सकता है।
विदेशी पूंजी के प्रवाह में बदलाव का असर भारतीय शेयर बाजार और रुपये पर भी पड़ सकता है। अगर निवेशक भारत से पैसा निकालकर अमेरिकी या जापानी बॉन्ड की ओर जाते हैं, तो रुपये पर दबाव और भारतीय परिसंपत्तियों में अस्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि इसका वास्तविक असर पूंजी प्रवाह, ब्याज दरों और वैश्विक जोखिम धारणा पर निर्भर करेगा।
बॉन्ड यील्ड बढ़ने का एक और असर कंपनियों की फंडिंग लागत पर पड़ सकता है। अगर वैश्विक ब्याज दरों में लंबे समय तक तेजी रहती है, तो कंपनियों और सरकारों के लिए कर्ज जुटाना महंगा हो सकता है। इससे निवेश और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
जापान की स्थिति में घरेलू कारण भी अहम हैं। वहां सरकारी कर्ज GDP के 200% से ज्यादा है और बढ़ती यील्ड का मतलब सरकार के लिए भविष्य में कर्ज की सर्विसिंग लागत बढ़ना हो सकता है। इसी वजह से बाजार जापान की राजकोषीय स्थिति और Bank of Japan की नीतियों पर करीबी नजर रख रहा है।
इसके साथ ही जापानी निवेशकों के विदेशी बॉन्ड से घरेलू बाजार की ओर लौटने की संभावना भी वैश्विक बाजार के लिए अहम है। Reuters के मुताबिक 2026 में जापानी निवेशकों ने विदेशी बॉन्ड में करीब 3 ट्रिलियन येन की शुद्ध बिक्री की है। अगर यह प्रवृत्ति तेज होती है तो वैश्विक बॉन्ड बाजार में पूंजी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, जापान की बॉन्ड यील्ड का 3% तक पहुंचना अपने आप में किसी तत्काल वैश्विक वित्तीय संकट का प्रमाण नहीं है। कुछ विश्लेषक इसे दशकों की बेहद ढीली मौद्रिक नीति से सामान्य ब्याज दरों की ओर लौटने की प्रक्रिया भी मानते हैं। लेकिन तेज और लगातार बढ़ती यील्ड बाजार में पुनर्मूल्यांकन और अस्थिरता जरूर बढ़ा सकती है।
कुल मिलाकर, जापान की बॉन्ड यील्ड में आया यह उछाल वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। उदय कोटक की ‘रोलर कोस्टर’ वाली चेतावनी इसी बढ़ती ब्याज दर और कर्ज की चिंता से जुड़ी है। भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम विदेशी पूंजी के प्रवाह, रुपये, बॉन्ड यील्ड और कंपनियों की कर्ज लागत के मोर्चे पर दिखाई दे सकता है। ऐसे में भारतीय निवेशकों के लिए आने वाले महीनों में ग्लोबल बॉन्ड मार्केट और केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।



