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सारी बर्फ पिघली तो क्या होगा?

नेपाल में हालिया बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं ने हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते मौसम और पिघलती बर्फ के खतरे को सामने ला दिया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियरों के पीछे हटने और हिमनद झीलों के बढ़ने से अचानक बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है। हाल की नेपाल त्रासदी में भी वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने और नदी के अस्थायी रूप से अवरुद्ध होने की आशंका जताई थी।

इसी बीच यह सवाल भी उठता है कि अगर धरती की सारी बर्फ पिघल जाए तो दुनिया का नक्शा कैसा दिखाई देगा? यह एक काल्पनिक स्थिति है और ऐसा बदलाव अचानक होने की संभावना नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि अगर जमीन पर मौजूद सभी ग्लेशियर और बड़ी आइस शीट पूरी तरह पिघल जाएं, तो समुद्र का स्तर करीब 70 मीटर तक बढ़ सकता है।

NASA के मुताबिक ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में दुनिया की अधिकांश ग्लेशियल बर्फ मौजूद है। दोनों आइस शीट अगर पूरी तरह पिघल जाएं, तो समुद्र का स्तर करीब 65 मीटर यानी लगभग 215 फीट बढ़ सकता है। इतना बड़ा बदलाव तटीय इलाकों और दुनिया के समुद्री शहरों के लिए विनाशकारी साबित होगा।

यहां एक जरूरी अंतर समझना भी अहम है। समुद्र में पहले से तैर रही समुद्री बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर उसी तरह नहीं बढ़ता, क्योंकि वह पहले से पानी में अपना आयतन विस्थापित कर रही होती है। इसके विपरीत जमीन पर मौजूद ग्लेशियर और आइस शीट का पिघला पानी समुद्र में पहुंचता है और समुद्र का स्तर बढ़ाता है।

अगर समुद्र का स्तर कई दसियों मीटर बढ़ जाए तो दुनिया के तटीय इलाकों का बड़ा हिस्सा पानी में समा सकता है। समुद्र के किनारे बसे शहर, बंदरगाह, औद्योगिक क्षेत्र और कृषि भूमि सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। तटीय आबादी को बड़े पैमाने पर दूसरी जगहों पर बसाना पड़ सकता है।

बांग्लादेश ऐसे परिदृश्य में सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाएगा। देश का बड़ा हिस्सा निचले और डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। समुद्र के स्तर में अत्यधिक वृद्धि होने पर यहां बड़ी मात्रा में जमीन के डूबने और खारे पानी के अंदर आने का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, ‘पूरा बांग्लादेश खत्म हो जाएगा’ कहना वैज्ञानिक रूप से बहुत सरल और अतिरंजित निष्कर्ष होगा।

भारत पर भी इसका व्यापक असर पड़ेगा। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और गुजरात जैसे तटीय क्षेत्रों में समुद्र के बढ़ते स्तर का प्रभाव पड़ सकता है। तटीय बस्तियों, खेती, बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव आएगा।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत का पूरा देश पानी में डूब जाएगा। समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी का प्रभाव स्थान की ऊंचाई और भौगोलिक स्थिति के हिसाब से अलग-अलग होगा। पहाड़ी, पठारी और समुद्र से दूर स्थित बड़े हिस्से इस काल्पनिक परिदृश्य में भी पानी के नीचे नहीं जाएंगे।

बर्फ के पिघलने का असर सिर्फ समुद्र के स्तर तक सीमित नहीं होगा। बर्फ धरती की सतह से सूर्य की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करती है। बर्फ घटने पर गहरे रंग की जमीन और समुद्र ज्यादा ऊर्जा सोख सकते हैं, जिससे जलवायु प्रणाली में और बदलाव आ सकता है। NASA भी बर्फ की इस जलवायु-नियामक भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है।

हिमालय के लिए चिंता का दूसरा पहलू ग्लेशियरों का तेजी से पीछे हटना है। ग्लेशियरों के पिघलने से शुरुआती दौर में कुछ नदियों में पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में बर्फ का भंडार घटने से सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। साथ ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनदी झील फटने से अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

हालिया नेपाल की घटना इसी व्यापक खतरे की याद दिलाती है। वैज्ञानिकों ने बताया कि अगस्त 2026 की विनाशकारी बाढ़ संभवतः ग्लेशियर के टूटने, नदी के अस्थायी रूप से अवरुद्ध होने और फिर जमा पानी के अचानक नीचे की ओर बहने से जुड़ी थी। इस तरह की घटनाएं हिमालय जैसे तेजी से गर्म हो रहे क्षेत्रों में निगरानी और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था की जरूरत को रेखांकित करती हैं।

हालांकि, ‘धरती की सारी बर्फ पिघलने’ वाला परिदृश्य निकट भविष्य की कोई वास्तविक भविष्यवाणी नहीं है। बड़ी आइस शीट का पूरा पिघलना बेहद लंबे समय में होने वाली प्रक्रिया होगी। NASA के अनुसार अंटार्कटिक आइस शीट के पूरी तरह पिघलने से समुद्र का स्तर करीब 57 मीटर बढ़ सकता है और यह प्रक्रिया सहस्राब्दियों में विकसित होगी।

फिर भी वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय यह है कि बर्फ का नुकसान अभी हो रहा है और समुद्र का स्तर पहले से बढ़ रहा है। NASA के नवीनतम समुद्र-स्तर संकेतक के अनुसार अगस्त 2026 तक 1993 के मुकाबले वैश्विक समुद्र स्तर करीब 91 मिलीमीटर बढ़ चुका है। इस वृद्धि में पिघलती जमीन की बर्फ और गर्म होते समुद्र दोनों की भूमिका है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अगर सारी बर्फ पिघल गई तो क्या होगा। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ग्लेशियर और आइस शीट कितनी तेजी से घट रहे हैं और इसका आने वाले दशकों में समुद्र, पानी, खेती और आबादी पर कितना असर पड़ेगा। नेपाल की हालिया बाढ़ जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि हिमालय में बदलाव के प्रभाव स्थानीय स्तर पर आज भी महसूस किए जा रहे हैं।

कुल मिलाकर, अगर धरती की सारी जमीन पर मौजूद बर्फ किसी काल्पनिक स्थिति में पिघल जाए तो वैश्विक समुद्र स्तर में करीब 70 मीटर तक की वृद्धि हो सकती है। बांग्लादेश और भारत के कई निचले तटीय क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित होंगे, लेकिन यह कहना कि ‘पूरा बांग्लादेश खत्म और पूरा भारत तबाह’ हो जाएगा, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। वास्तविक चुनौती आज हो रहे ग्लेशियर क्षरण, समुद्र-स्तर वृद्धि और अचानक आने वाली हिमनदी बाढ़ के जोखिम को कम करना है।

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