वेनेजुएला की मुद्रा बनाम भारतीय रुपया: महंगाई ने कैसे गिराई हैसियत

वेनेजुएला की करेंसी का नाम बोलीवार (Venezuelan Bolívar) है, जिसे देश की आज़ादी के नायक सिमोन बोलेवार के नाम पर रखा गया है। कभी लैटिन अमेरिका के समृद्ध देशों में गिने जाने वाला वेनेजुएला आज अपनी करेंसी की बदहाली के लिए दुनिया भर में चर्चा का विषय बन चुका है। हालात इतने खराब हो गए कि सरकार को 10 लाख बोलेवार (1,000,000 Bolívar) तक का नोट छापना पड़ा। यह कदम देश में बढ़ती हाइपरइन्फ्लेशन (अत्यधिक महंगाई) का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है।
दरअसल, वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था लंबे समय से तेल पर निर्भर रही है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, तो देश की आय पर गहरा असर पड़ा। इसके साथ ही गलत आर्थिक नीतियां, भ्रष्टाचार, उत्पादन में कमी और विदेशी प्रतिबंधों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। नतीजा यह हुआ कि सरकार ने खर्च चलाने के लिए जरूरत से ज्यादा नोट छापे, जिससे मुद्रा की कीमत तेजी से गिरती चली गई।
महंगाई का आलम यह रहा कि रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए लोगों को नोटों के बंडल लेकर जाना पड़ता था। इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने समय-समय पर करेंसी से शून्य हटाए और नई करेंसी लाई, जिसे बोलीवार फुएर्ते और बाद में बोलीवार सोबेरानो नाम दिया गया। बावजूद इसके, आम लोगों की परेशानी कम नहीं हुई।
अगर भारतीय रुपये से तुलना करें, तो वेनेजुएला की करेंसी की हैसियत बेहद कमजोर हो चुकी है। जहां कुछ दशक पहले बोलेवार एक मजबूत मुद्रा मानी जाती थी, वहीं आज हालात ऐसे हैं कि एक भारतीय रुपया कई हजार बोलेवार के बराबर हो चुका है। इसका सीधा असर जनता की क्रय शक्ति पर पड़ा है और लाखों लोग गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के लिए मजबूर हुए हैं।
वेनेजुएला की करेंसी का यह संकट दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है कि अगर अर्थव्यवस्था में संतुलन न रखा जाए और महंगाई पर नियंत्रण न हो, तो मजबूत से मजबूत मुद्रा भी कागज के टुकड़े में बदल सकती है।



