बस्तर के 90 से अधिक गांवों में पहली बार फहराया तिरंगा, माओवाद के साए से निकला इलाका

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के 90 से अधिक गांवों में इस बार स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार तिरंगा फहराया गया। लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाले इन इलाकों में राष्ट्रीय पर्व मनाने को लेकर भय का माहौल रहा था। ऐसे में गांवों में तिरंगा फहराना स्थानीय लोगों के लिए सिर्फ स्वतंत्रता दिवस समारोह नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की वापसी का प्रतीक बन गया।
90 से अधिक गांवों में बदला माहौल
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस वर्ष बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 90 से अधिक गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया गया। इससे पहले इन इलाकों में माओवादी प्रभाव के कारण राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराना संभव नहीं था।
इससे पहले जनवरी 2026 में भी बस्तर के कई गांवों में पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया गया था। यानी क्षेत्र में राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन का दायरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
पहले रहता था माओवादियों का दबदबा
बस्तर लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहा है। बस्तर संभाग के दूरदराज इलाकों में सुरक्षा, सड़क और सरकारी सेवाओं की पहुंच भी चुनौतीपूर्ण रही।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने फरवरी 2026 में बस्तर के बारे में कहा था कि यह क्षेत्र करीब चार दशकों तक माओवाद से प्रभावित रहा और इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं, आदिवासियों और अन्य स्थानीय समुदायों पर पड़ा। उन्होंने यह भी कहा था कि सुरक्षा अभियानों के बाद भय और असुरक्षा का माहौल कम हो रहा है।
तिरंगा बना बदलाव का प्रतीक
इस बार गांवों में बच्चों और ग्रामीणों ने तिरंगा लेकर प्रभात फेरी और ध्वजारोहण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। सुकमा के करीब 50 गांवों में भी पहली बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में कार्यक्रम हुए।
इन आयोजनों को ग्रामीण क्षेत्रों में भय से सामान्य जीवन की ओर लौटने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
बस्तर तिरंगा यात्रा भी बनी आकर्षण
स्वतंत्रता दिवस से पहले 12 से 14 अगस्त तक ‘बस्तर तिरंगा यात्रा’ निकाली गई। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों में राष्ट्रीय एकता और शांति का संदेश पहुंचाना था, जहां कभी माओवादी हिंसा का प्रभाव रहा था। यात्रा नारायणपुर से शुरू हुई और कर्रेगुट्टा क्षेत्र तक पहुंची।
कभी माओवादियों के मजबूत गढ़ मानी जाने वाली कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर भी पहली बार तिरंगा फहराया गया।
अब विकास पर बढ़ रहा जोर
माओवादी हिंसा में कमी के साथ बस्तर में सरकार का फोकस सड़क, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने पर भी है। केंद्र सरकार ने भी बस्तर में बदलते माहौल को विकास और स्थानीय लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास से जोड़ा है।
दशकों बाद दिखा नया बस्तर
इन गांवों में पहली बार तिरंगा फहराना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक दिन का आयोजन नहीं है। यह उन इलाकों में लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय पर्वों की सामान्य वापसी का संकेत है, जहां लंबे समय तक हिंसा और भय का असर रहा।
कुल मिलाकर, बस्तर के 90 से अधिक गांवों में तिरंगा फहराया जाना क्षेत्र में बदलते सुरक्षा माहौल और सामान्य जीवन की ओर बढ़ते कदम की बड़ी तस्वीर पेश करता है। अब चुनौती इस बदलाव को स्थायी शांति, बेहतर सुविधाओं और विकास के अवसरों में बदलने की है।



