
भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों के बावजूद सीमा से जुड़े कुछ मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है दसगजा, जिसे आम तौर पर नो-मैन्स लैंड या दोनों देशों के बीच का सीमावर्ती क्षेत्र कहा जाता है। कई स्थानों पर सीमा स्तंभों की स्थिति, नदी के बदलते प्रवाह और अतिक्रमण जैसी वजहों से इस क्षेत्र की वास्तविक सीमा को लेकर भ्रम की स्थिति बनती रही है।
दसगजा का सामान्य अर्थ भारत और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा के बीच छोड़ा गया ऐसा क्षेत्र है, जहां दोनों देशों की ओर से स्थायी निर्माण और गतिविधियों को लेकर विशेष नियम लागू होते हैं। लेकिन जमीन पर कई जगह हालात अलग हैं। आबादी बढ़ने और स्थानीय जरूरतों के चलते इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं।
सीमा की सही स्थिति निर्धारित करने में सीमा स्तंभ सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होते हैं। समय के साथ नदियों के कटाव, बाढ़ और प्राकृतिक बदलावों के कारण कई सीमा स्तंभ क्षतिग्रस्त या विस्थापित हो जाते हैं। ऐसे में जमीन पर सीमा का निर्धारण करना दोनों देशों के अधिकारियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
अब आधुनिक तकनीक की मदद से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की जा रही है। ड्रोन कैमरों के जरिए दसगजा क्षेत्र की हाई-रिजॉल्यूशन मैपिंग की जाएगी। इससे जमीन की स्थिति, सीमा स्तंभों का स्थान और आसपास के भौगोलिक बदलावों की सटीक तस्वीर हासिल करने में मदद मिलेगी।
ड्रोन से तैयार तस्वीरों और मैपिंग डेटा को पुराने सर्वे रिकॉर्ड और सीमा स्तंभों की जानकारी से मिलाया जा सकता है। इससे उन इलाकों की पहचान करने में आसानी होगी जहां सीमा को लेकर दोनों पक्षों के बीच भ्रम या मतभेद मौजूद हैं।
भारत-नेपाल सीमा की एक खासियत यह भी है कि यह कई हिस्सों में खुली सीमा है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच आवागमन, व्यापार और सामाजिक रिश्ते लंबे समय से चलते आए हैं। यही वजह है कि सीमा प्रबंधन में सुरक्षा के साथ स्थानीय लोगों की जरूरतों का संतुलन भी महत्वपूर्ण रहता है।
सीमा पर अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों को लेकर समय-समय पर दोनों देशों के स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सटीक डिजिटल मैपिंग भविष्य में सीमा प्रबंधन को बेहतर बनाने में उपयोगी साबित हो सकती है।
ड्रोन सर्वे से मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल केवल विवाद सुलझाने के लिए ही नहीं, बल्कि सीमा स्तंभों की निगरानी और रखरखाव के लिए भी किया जा सकता है। इससे किसी सीमा स्तंभ के क्षतिग्रस्त होने या अपनी जगह से हटने की स्थिति में समय रहते कार्रवाई संभव होगी।
भारत और नेपाल के बीच सीमा संबंधी मामलों को बातचीत और संयुक्त तंत्र के जरिए सुलझाने की कोशिश होती रही है। तकनीक के इस्तेमाल से दोनों देशों के अधिकारियों के पास जमीन की स्थिति का अधिक सटीक और साझा रिकॉर्ड तैयार करने का अवसर मिलेगा।



