चंद्र ग्रहण 2026: राहु-केतु, अमृत और चंद्रमा की पौराणिक कहानी का रहस्य

Chandra Grahan 2026 को लेकर ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं में एक बार फिर समुद्र मंथन की कथा चर्चा में है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तो अमृत कलश लेकर भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। इसी दौरान असुर स्वरभानु ने देवता का वेश धारण कर अमृत की पंक्ति में बैठकर दो घूंट पी लिए। जैसे ही अमृत उसके कंठ से नीचे उतरने लगा, सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर ली और यह सूचना भगवान विष्णु को दी। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। किंतु अमृत की दो बूंदें गले से नीचे जा चुकी थीं, इसलिए उसका सिर और धड़ दोनों अमर हो गए। यही सिर आगे चलकर राहु और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुए।
मान्यता है कि सूर्य और चंद्रमा द्वारा भेद खोलने के कारण राहु और केतु उनसे शत्रुता रखने लगे। जब भी अवसर मिलता है, राहु सूर्य या चंद्रमा को ग्रसने का प्रयास करता है, जिसे हम ग्रहण के रूप में देखते हैं। चंद्र ग्रहण के समय कहा जाता है कि राहु चंद्रमा को निगल लेता है, लेकिन चंद्रमा अमर होने के कारण पुनः मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि चंद्र ग्रहण अस्थायी होता है और कुछ समय बाद चंद्रमा पुनः पूर्ण रूप में दिखाई देता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्र ग्रहण पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण होता है, जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। लेकिन पौराणिक कथा इसे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश से जोड़ती है—धोखे और छल का परिणाम अंततः दंड ही होता है। Chandra Grahan 2026 के अवसर पर श्रद्धालु स्नान, दान और मंत्र जाप करते हैं और इसे आध्यात्मिक शुद्धि का समय मानते हैं। इस तरह समुद्र मंथन की वह कथा आज भी भारतीय संस्कृति में जीवंत है और चंद्रमा से जुड़े हर ग्रहण को एक गहरी पौराणिक पृष्ठभूमि प्रदान करती है।



