
EVM वोटों की गिनती में टोटलाइजर मशीन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि इस व्यवस्था को लागू करने में क्या कानूनी, तकनीकी या व्यावहारिक बाधाएं हैं। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की।
टोटलाइजर एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें करीब 14 मतदान केंद्रों की EVM के वोटों को एक साथ जोड़ा जा सकता है। इसके बाद उम्मीदवारों को मिले कुल वोटों का संयुक्त आंकड़ा सामने आता है, लेकिन किसी एक बूथ का अलग-अलग परिणाम सार्वजनिक नहीं होता।
इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क है कि बूथवार मतदान पैटर्न सामने आने से किसी इलाके के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाया जा सकता है। टोटलाइजर के इस्तेमाल से इस तरह की पहचान मुश्किल हो सकती है और मतदाताओं को चुनाव के बाद संभावित दबाव या प्रताड़ना से सुरक्षा मिल सकती है।
मौजूदा व्यवस्था में EVM के कंट्रोल यूनिट का परिणाम अलग-अलग मतदान केंद्रों के आधार पर देखा जाता है। टोटलाइजर लागू होने पर कई EVM के परिणाम एक साथ प्रदर्शित होंगे। इससे बूथ स्तर पर उम्मीदवारों को मिले वोटों का आंकड़ा सीधे सामने नहीं आएगा।
हालांकि इस व्यवस्था को लागू करने में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी बताई गई हैं। चुनाव प्रक्रिया में EVM के साथ VVPAT की जांच, परिणामों के सत्यापन और मौजूदा नियमों में संभावित बदलाव जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।
चुनाव आयोग पहले भी टोटलाइजर के विचार का समर्थन कर चुका है, लेकिन इसके कार्यान्वयन को लेकर राजनीतिक और नियामकीय स्तर पर मतभेद रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से भी इसके व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा है कि टोटलाइजर मशीन लागू करने में क्या बाधाएं हैं और इससे चुनाव प्रक्रिया पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है या नहीं। केंद्र के जवाब के बाद मामले में आगे की दिशा तय हो सकती है।
टोटलाइजर को लेकर बहस का मुख्य मुद्दा मतदाताओं की गोपनीयता और चुनावी पारदर्शिता के बीच संतुलन है। एक तरफ बूथवार मतदान पैटर्न को छिपाने से मतदाताओं की निजता मजबूत हो सकती है, वहीं दूसरी ओर उम्मीदवारों और एजेंटों के लिए बूथ स्तर पर परिणामों की निगरानी का स्वरूप बदल सकता है।



