ईरान युद्ध में घटा अमेरिका का मिसाइल स्टॉक, चीन-रूस से बढ़ी चिंता

ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिका के सामने एक नई रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। महीनों चले सैन्य अभियान में बड़ी संख्या में लंबी दूरी की मिसाइलों और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल हुआ, जिससे अमेरिकी हथियार भंडार पर दबाव बढ़ा है। रिपोर्टों के अनुसार कुछ प्रमुख लंबी दूरी के हथियारों का स्टॉक काफी कम हुआ है।
सबसे ज्यादा चिंता Patriot और THAAD जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर है। ये सिस्टम दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं और इनके आसानी से उपलब्ध विकल्प सीमित हैं। अमेरिकी और सहयोगी बलों ने मध्य पूर्व के साथ-साथ यूरोप और अन्य क्षेत्रों में भी इनकी जरूरत महसूस की है।
अमेरिकी हथियार भंडार की स्थिति का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है। रणनीतिक विशेषज्ञों को चिंता है कि अगर अमेरिका को लंबे समय तक अपने मिसाइल स्टॉक को दोबारा भरने में समय लगा, तो चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी इस स्थिति को अमेरिकी सैन्य तैयारी की कमजोरी के रूप में देख सकते हैं।
चीन को लेकर चिंता खास तौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में है। किसी संभावित ताइवान संकट में अमेरिका को लंबी दूरी की मिसाइलों और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर की बड़ी जरूरत पड़ सकती है। विश्लेषकों के मुताबिक चीन के पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक और एंटी-शिप मिसाइलें हैं, जिससे अमेरिकी सैन्य ठिकानों की रक्षा एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
रूस के मामले में भी स्थिति संवेदनशील है। यूरोप में अमेरिकी सैन्य संसाधनों और मिसाइल इंटरसेप्टर के स्टॉक पर दबाव के बीच रूस की मिसाइल क्षमता पर नजर बनी हुई है। यूक्रेन को उपलब्ध कराए गए अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम ने भी अमेरिकी भंडार को प्रभावित किया है।
हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिकी मिसाइल भंडार में कमी को तत्काल सैन्य असुरक्षा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अमेरिका के पास अभी भी बड़ी संख्या में हथियार मौजूद हैं और उसने उत्पादन बढ़ाने के लिए रक्षा कंपनियों के साथ बड़े अनुबंध किए हैं। Patriot इंटरसेप्टर के उत्पादन को कई गुना बढ़ाने की योजना भी इसी दिशा में एक कदम है।
अमेरिका के सामने असली चुनौती उत्पादन की गति और भविष्य की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की है। कुछ आधुनिक मिसाइलों और इंटरसेप्टर के उत्पादन में वर्षों लग सकते हैं। ऐसे में ईरान जैसे क्षेत्रीय संघर्ष में हथियारों की भारी खपत ने अमेरिका को दो मोर्चों—मध्य पूर्व और संभावित यूरोप या इंडो-पैसिफिक संकट—के लिए अपनी तैयारी पर फिर से विचार करने को मजबूर किया है।
फिलहाल अमेरिका का फोकस अपने घटते हथियार भंडार को तेजी से भरने पर है। ईरान युद्ध ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति में अमेरिकी सैन्य क्षमता कितनी टिकाऊ रहेगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मिसाइल स्टॉक में कमी के आधार पर चीन या रूस के साथ तत्काल टकराव की आशंका जताना सही नहीं होगा।



