अमेरिका की नई परमाणु रणनीति, रूस-चीन से संभावित संघर्ष के लिए छोटे परमाणु हथियारों पर जोर

अमेरिका अपनी परमाणु नीति की समीक्षा कर रहा है और बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल को देखते हुए नई रणनीति पर काम कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ संभावित सैन्य टकराव की स्थिति में कम क्षमता (लो-यील्ड) वाले परमाणु हथियारों की भूमिका पर अधिक जोर दिया जा सकता है।
लो-यील्ड परमाणु हथियार अपेक्षाकृत कम विस्फोटक क्षमता वाले होते हैं, लेकिन वे भी परमाणु हथियार ही हैं और इनके इस्तेमाल के गंभीर मानवीय, पर्यावरणीय और सामरिक परिणाम हो सकते हैं। इन्हें कुछ रणनीतिक परिस्थितियों में प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) बढ़ाने के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
अमेरिका का कहना है कि उसकी परमाणु नीति का मुख्य उद्देश्य प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना, सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संभावित खतरों का मुकाबला करना है। वहीं, रूस और चीन भी अपनी सैन्य तथा परमाणु क्षमताओं का लगातार आधुनिकीकरण कर रहे हैं, जिससे वैश्विक सामरिक प्रतिस्पर्धा तेज हुई है।
हथियार नियंत्रण और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु रणनीतियों में किसी भी तरह का बदलाव वैश्विक सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसे कदमों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नजर रखी जाती है।
दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच परमाणु हथियारों से जुड़े फैसले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति और हथियार नियंत्रण की बहस को नई दिशा दे सकते हैं।



