
आज से करीब पांच दशक पहले दुनिया में एक बेहद अनोखी योजना पर चर्चा हुई थी—अंटार्कटिका के विशाल हिमखंडों (Icebergs) को खींचकर पानी की कमी वाले देशों तक पहुंचाना। इस विचार का उद्देश्य रेगिस्तानी इलाकों में मीठे पानी की समस्या को हल करना था, जिसमें सऊदी अरब जैसे देशों को भी संभावित लाभार्थी माना गया था।
1977 के आसपास ऐसे विचारों को लेकर अमेरिका में भी प्रयोग और चर्चाएं हुईं। एक विशाल हिमखंड को लेकर अध्ययन किया गया कि क्या उसे समुद्र के रास्ते दूर तक खींचकर ले जाना संभव हो सकता है। इस तरह के प्रोजेक्ट को लेकर इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने कई तकनीकी चुनौतियों पर विचार किया।
आइसबर्ग को ले जाने में क्या थीं मुश्किलें?
- हिमखंड को गर्म समुद्री क्षेत्रों तक सुरक्षित पहुंचाना
- रास्ते में उसके पिघलने से बचाना
- उसे नियंत्रित दिशा में खींचना
- भारी लागत और तकनीकी संसाधनों की जरूरत
आइसबर्ग में मौजूद पानी की मात्रा बेहद विशाल हो सकती है। इसी कारण 1970 और 1980 के दशक में कई देशों में इसे पानी की कमी से निपटने के एक संभावित समाधान के रूप में देखा गया।
हालांकि, व्यवहार में यह योजना बेहद कठिन साबित हुई। समुद्री धाराएं, मौसम, लागत और हिमखंड के पिघलने जैसी समस्याओं के कारण इसे बड़े स्तर पर लागू नहीं किया जा सका।
आज भी ग्लेशियर और हिमखंडों से जुड़े शोध जारी हैं, लेकिन समुद्र के रास्ते आइसबर्ग को एक देश से दूसरे देश तक ले जाने का विचार अब भी मुख्य रूप से एक ऐतिहासिक और महत्वाकांक्षी कल्पना के रूप में देखा जाता है।



