Balochistan Crisis: फैसल नसीर की एंट्री से क्यों बढ़ा डेथ स्क्वाड का विवाद?

पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर सुर्खियों में है। क्षेत्र में अलगाववादी हिंसा और सुरक्षा बलों के अभियानों के बीच पाकिस्तानी सेना की रणनीति को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। हालिया घटनाक्रम में मेजर जनरल फैसल नसीर का नाम खास तौर पर चर्चा में आया है।
फैसल नसीर को सितंबर 2026 में नेशनल काउंटर टेररिज्म अथॉरिटी यानी NACTA का नेशनल कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। पाकिस्तान सरकार की अधिसूचना के मुताबिक उनकी नियुक्ति तीन साल के लिए सेकंडमेंट आधार पर हुई है।
फैसल नसीर इससे पहले ISI के इंटरनल विंग के प्रमुख पद पर थे। उनकी NACTA में नियुक्ति को पाकिस्तान की आतंकवाद रोधी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। इससे सुरक्षा और खुफिया तंत्र के बीच समन्वय को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।
इसी बीच बलूचिस्तान में कथित ‘डेथ स्क्वाड’ को लेकर भी आरोप सामने आ रहे हैं। कुछ बलूच मानवाधिकार समूह आरोप लगाते हैं कि स्थानीय हथियारबंद नेटवर्क का इस्तेमाल बलूच राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं और विरोधियों के खिलाफ किया जाता रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में उपलब्ध नहीं है।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा है क्योंकि बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA की गतिविधियां लगातार जारी हैं। हाल के दिनों में BLA ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमलों की जिम्मेदारी लेने के दावे किए हैं, जबकि पाकिस्तान की सेना ने जवाबी अभियानों में बड़ी संख्या में आतंकियों के मारे जाने की जानकारी दी है।
पाकिस्तानी सेना के मुताबिक सितंबर की शुरुआत में बलूचिस्तान के मस्तुंग, सिबी, क्वेटा और कलात जिलों में खुफिया जानकारी के आधार पर अभियान चलाए गए। सेना ने दावा किया कि इन अभियानों में 48 आतंकवादी मारे गए। हालांकि सैन्य अभियानों से जुड़े ऐसे आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि हमेशा संभव नहीं होती।
दूसरी ओर BLA ने भी हाल में पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों को निशाना बनाए जाने का दावा किया है। संगठन ने दो हमलों में 25 सैनिकों के मारे जाने की बात कही, हालांकि पाकिस्तानी सरकार की ओर से इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई।
ऐसे माहौल में फैसल नसीर की NACTA में नियुक्ति का महत्व बढ़ जाता है। NACTA पाकिस्तान की आतंकवाद और चरमपंथ से निपटने वाली प्रमुख संस्थाओं में शामिल है। फैसल नसीर का खुफिया क्षेत्र का अनुभव सरकार के लिए सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल में उपयोगी हो सकता है।
हालांकि ‘डेथ स्क्वाड’ से जुड़े आरोप बेहद गंभीर हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। बलूचिस्तान में लंबे समय से जबरन गुमशुदगी, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप सामने आते रहे हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार और सेना बलूच विद्रोही संगठनों को सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानती है।
कुल मिलाकर बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा ने पाकिस्तान की सुरक्षा नीति को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। BLA के हमलों, पाकिस्तानी सेना के जवाबी अभियानों और फैसल नसीर की NACTA में नियुक्ति के बीच आने वाले दिनों में क्षेत्र की स्थिति पर नजर बनी रहेगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई सुरक्षा रणनीति हिंसा को कम कर पाएगी या बलूचिस्तान में टकराव और गहरा होगा।



