UN New World Map: बदलेगा दुनिया का नक्शा, असली आकार में दिखेगा अफ्रीका

संयुक्त राष्ट्र में विश्व मानचित्र को लेकर एक ऐतिहासिक पहल सामने आई है। 4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐसे मानचित्र को बढ़ावा देने के पक्ष में मतदान किया, जिसमें दुनिया के देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखाई देता है। यह पहल खास तौर पर अफ्रीका के वास्तविक आकार को सही ढंग से दिखाने पर केंद्रित है।
अब तक दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले Mercator Projection की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देता है। इसके उलट अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्रों का आकार वास्तविकता से छोटा नजर आता है। यही वजह है कि अफ्रीका लंबे समय से अपने वास्तविक भौगोलिक आकार के गलत प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाता रहा है।
नए प्रस्ताव में Equal Earth projection को प्रमुख विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया गया है। यह 2018 में विकसित किया गया ऐसा मानचित्र प्रक्षेपण है, जो अलग-अलग महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा संतुलित तरीके से प्रदर्शित करता है। इसका उद्देश्य दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात में दिखाना है।
अफ्रीका नक्शे पर क्यों दिखेगा बड़ा?
मर्केटर नक्शे में ध्रुवों के पास के इलाकों का आकार काफी बढ़ जाता है। यही कारण है कि ग्रीनलैंड और अफ्रीका कई सामान्य विश्व मानचित्रों पर लगभग समान आकार के नजर आ सकते हैं, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है। नए समान-क्षेत्रफल वाले प्रक्षेपण में यह अंतर काफी स्पष्ट दिखाई देगा।
इस बदलाव का असर केवल अफ्रीका पर नहीं पड़ेगा। भारत, लैटिन अमेरिका और भूमध्यरेखा के आसपास स्थित दूसरे क्षेत्रों का आकार भी पारंपरिक मर्केटर मानचित्र की तुलना में अधिक वास्तविक नजर आएगा। इससे छात्रों और आम लोगों की वैश्विक भौगोलिक समझ में बदलाव आ सकता है।
मर्केटर मैप की शुरुआत क्यों हुई थी?
मर्केटर प्रोजेक्शन 16वीं सदी में कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने विकसित किया था। इसका मूल उद्देश्य समुद्री नौवहन को आसान बनाना था। इसमें दिशा और कोणों को इस तरह प्रस्तुत किया गया कि समुद्री यात्राओं के लिए यह काफी उपयोगी साबित हुआ। हालांकि, दुनिया के सामान्य मानचित्र के रूप में इस्तेमाल करने पर इसके क्षेत्रफल संबंधी विकृतियां सामने आती हैं।
यही वजह है कि आधुनिक समय में कई विश्व मानचित्र दूसरे प्रक्षेपणों का इस्तेमाल करते हैं। अब अफ्रीकी संघ समर्थित अभियान चाहता है कि स्कूलों, सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और तकनीकी कंपनियों में ऐसे मानचित्रों का ज्यादा इस्तेमाल हो जो महाद्वीपों के वास्तविक आकार को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करें।
क्या मर्केटर मैप पूरी तरह खत्म हो जाएगा?
नहीं। संयुक्त राष्ट्र का यह कदम मर्केटर प्रोजेक्शन पर तत्काल प्रतिबंध नहीं लगाता। महासभा का प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में ज्यादा सटीक और समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। मर्केटर प्रोजेक्शन नौवहन जैसे विशेष उपयोगों में अभी भी उपयोगी रह सकता है।
पहल के पीछे अफ्रीकी संघ
इस अभियान को टोगो ने आगे बढ़ाया और अफ्रीकी संघ के सभी 55 सदस्य देशों ने इसका समर्थन किया है। अभियान के समर्थकों का कहना है कि नक्शा केवल भौगोलिक जानकारी का माध्यम नहीं है, बल्कि यह दुनिया के बारे में लोगों की सोच को भी प्रभावित करता है। इसलिए अफ्रीका को उसके वास्तविक आकार में दिखाना वैश्विक प्रतिनिधित्व को ज्यादा संतुलित बनाने की दिशा में कदम माना जा रहा है।
इस पहल का नाम ‘Correct the Map’ अभियान से भी जुड़ा है। इसका लक्ष्य शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में ऐसे विश्व मानचित्रों को बढ़ावा देना है जो देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा सही ढंग से प्रदर्शित करें।
फ्रांस ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए अपने आधिकारिक उपयोग के लिए Eckert IV projection अपनाने की घोषणा की है। इससे संकेत मिलता है कि विश्व मानचित्र को लेकर बहस अब केवल अफ्रीकी देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यूरोप में भी इसे लेकर बदलाव शुरू हो रहे हैं।
कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र का यह फैसला दुनिया का नक्शा रातोंरात नहीं बदलेगा, लेकिन यह वैश्विक मानचित्रण में एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत जरूर है। अगर Equal Earth और दूसरे समान-क्षेत्रफल वाले प्रक्षेपणों का इस्तेमाल बढ़ता है, तो भविष्य में स्कूलों की किताबों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सार्वजनिक मानचित्रों पर दुनिया का रूप आज की तुलना में काफी अलग दिखाई दे सकता है।



