H-1B Visa पर संकट? भारतीयों की सफलता से बदला अमेरिका का रुख, समझें क्या है खतरा

अमेरिका का ‘American Dream’ दुनिया भर के लोगों को दशकों से आकर्षित करता रहा है। बेहतर नौकरी, ऊंची कमाई और करियर की संभावनाओं की वजह से बड़ी संख्या में भारतीय छात्र और प्रोफेशनल अमेरिका पहुंचे। इनमें से कई ने टेक्नोलॉजी, मेडिकल, रिसर्च और बिजनेस के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
लेकिन अब अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। खासतौर पर H-1B वीजा को लेकर ट्रंप प्रशासन का रुख पहले के मुकाबले काफी सख्त दिखाई दे रहा है। सरकार का तर्क है कि वीजा प्रोग्राम का दुरुपयोग रोकना और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना जरूरी है।
H-1B वीजा अमेरिका में विशेषज्ञता रखने वाले विदेशी कर्मचारियों को रोजगार देने के लिए इस्तेमाल होता है। टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मेडिकल और दूसरे हाई-स्किल क्षेत्रों में इसकी बड़ी भूमिका है। भारतीय नागरिक लंबे समय से इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल रहे हैं।
अब इस व्यवस्था की लागत और नियम दोनों बदल रहे हैं। नई H-1B नियुक्तियों पर प्रस्तावित शुल्क करीब 1 लाख डॉलर से अधिक तक पहुंच चुका है। इससे उन अमेरिकी कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है जो विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करना चाहती हैं।
इसका सीधा असर भारतीय युवाओं पर पड़ सकता है, जो अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद H-1B के जरिए नौकरी और लंबे समय तक रहने की योजना बनाते हैं। महंगी स्पॉन्सरशिप, सख्त जांच और नौकरी के बाजार में अनिश्चितता ऐसे उम्मीदवारों के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।
सिर्फ नए आवेदक ही नहीं, अमेरिका में पहले से काम कर रहे H-1B कर्मचारियों के लिए भी परिस्थितियां बदल रही हैं। प्रशासन 60 दिन की उस ग्रेस पीरियड को खत्म करने का प्रस्ताव आगे बढ़ा रहा है, जिसमें नौकरी जाने के बाद H-1B कर्मचारी नई नौकरी तलाश सकते थे या अपना इमिग्रेशन स्टेटस बदलने की कोशिश कर सकते थे। यह प्रस्ताव अभी अंतिम नियम नहीं बना है।
भारतीय परिवारों के लिए H-4 वर्क परमिट भी बड़ी चिंता बन गया है। ट्रंप प्रशासन H-1B कर्मचारियों के कुछ जीवनसाथियों को मिलने वाले काम के अधिकार को खत्म करने का प्रस्ताव ला रहा है। यदि यह लागू होता है तो उन परिवारों की दोहरी आय पर असर पड़ सकता है, जहां H-1B धारक के जीवनसाथी भी अमेरिका में काम करते हैं।
इमिग्रेशन की मुश्किलें सिर्फ H-1B तक सीमित नहीं हैं। भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड का बैकलॉग पहले से बहुत बड़ा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के मामले में भारतीय आवेदकों को बेहद लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
यही वजह है कि अमेरिका में रहने वाले कई भारतीय प्रोफेशनल्स अपने भविष्य को लेकर दोबारा सोच रहे हैं। कुछ लोग कनाडा, यूरोप या भारत में करियर के विकल्प तलाश रहे हैं, जबकि कुछ अमेरिकी इमिग्रेशन व्यवस्था में बदलाव का इंतजार कर रहे हैं। हाल में कुछ भारतीय प्रोफेशनल्स के अमेरिका छोड़कर भारत लौटने की व्यक्तिगत कहानियां भी सामने आई हैं।
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू अमेरिकी राजनीति है। MAGA समर्थक राजनीति में लंबे समय से अवैध और बड़े पैमाने पर प्रवासन को अमेरिकी नौकरियों तथा वेतन के लिए खतरे के रूप में पेश किया जाता रहा है। इसी माहौल में H-1B जैसे कानूनी हाई-स्किल वीजा प्रोग्राम पर भी राजनीतिक बहस तेज हुई है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीयों की सफलता से अमेरिकी समाज का पूरा हिस्सा परेशान है। अमेरिका में H-1B के समर्थकों का तर्क है कि विदेशी विशेषज्ञ ऐसी नौकरियां भरते हैं जिनके लिए पर्याप्त घरेलू प्रतिभा उपलब्ध नहीं होती। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में STEM और हाई-स्किल कर्मचारियों की जरूरत को लेकर भी काफी चर्चा है।
विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा H-1B प्रोग्राम के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है। अमेरिकी अधिकारियों ने कुछ IT staffing कंपनियों पर विदेशी कर्मचारियों को कम लागत पर नियुक्त कर अलग-अलग क्लाइंट कंपनियों में लगाने और वीजा प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करने जैसे आरोप लगाए हैं। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाना जरूरी है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में सिर्फ वीजा हासिल करना ही चुनौती नहीं होगा, बल्कि उम्मीदवार की नौकरी, कंपनी, वेतन, योग्यता और दस्तावेजों की जांच भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे कंपनियों और विदेशी कर्मचारियों दोनों के लिए प्रक्रिया महंगी और जटिल हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि H-1B पर सख्ती का असर अमेरिका के साथ-साथ भारत पर भी पड़ सकता है। अगर भारतीय प्रोफेशनल्स अमेरिका जाने के बजाय भारत में ही करियर बनाते हैं, तो देश के टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप सेक्टर को अनुभवी प्रतिभा वापस मिलने का फायदा हो सकता है। कुछ कंपनियां पहले से ही ग्लोबल हायरिंग रणनीति में बदलाव पर विचार कर रही हैं।
फिर भी अमेरिका भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए पूरी तरह बंद होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। H-1B कार्यक्रम अभी भी मौजूद है और अमेरिकी टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर तथा रिसर्च सेक्टर में हाई-स्किल कर्मचारियों की मांग बनी हुई है। असली बदलाव यह है कि अब अमेरिका जाने और वहां लंबे समय तक टिके रहने की राह पहले की तुलना में ज्यादा महंगी और अनिश्चित होती जा रही है।
इसलिए ‘American Dream खत्म हो गया’ कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन उसका स्वरूप जरूर बदल रहा है। भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका अब सिर्फ अच्छी नौकरी और ऊंची सैलरी का सपना नहीं है, बल्कि वीजा लागत, ग्रीन कार्ड बैकलॉग, नौकरी की सुरक्षा और बदलती इमिग्रेशन पॉलिसी का जोखिम भी साथ लेकर आता है।
आने वाले महीनों में H-1B फीस, 60-day grace period, H-4 work authorization और ग्रीन कार्ड नियमों पर होने वाले फैसले भारतीयों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल कई प्रस्ताव प्रक्रिया में हैं, इसलिए हर संभावित बदलाव को लागू नियम मानना सही नहीं होगा।
कुल मिलाकर, भारतीयों के लिए अमेरिका का दरवाजा बंद नहीं हुआ है, लेकिन उस दरवाजे तक पहुंचने की कीमत और अनिश्चितता दोनों बढ़ गई हैं। H-1B पर सख्ती, ग्रीन कार्ड का लंबा इंतजार और अमेरिकी राजनीति में बढ़ता इमिग्रेशन विरोध भारतीय प्रोफेशनल्स के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। यही वजह है कि आज का ‘American Dream’ पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल दिखाई देता है।



