SCO Summit के बाद भारत की असली परीक्षा, चीन का दबदबा और पाकिस्तान की मेजबानी

शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के बिश्केक शिखर सम्मेलन के खत्म होने के बाद भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती का एक नया दौर शुरू हो गया है। 31 अगस्त से 1 सितंबर 2026 तक किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुए सम्मेलन में क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, कनेक्टिविटी, व्यापार और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। सम्मेलन के बाद SCO की अध्यक्षता पाकिस्तान को मिल गई है, जिससे भारत के लिए आने वाला साल रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है।
SCO में चीन का प्रभाव लंबे समय से काफी मजबूत माना जाता है। चीन क्षेत्रीय व्यापार, बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश करता है। संगठन के भीतर उसकी आर्थिक ताकत उसे एजेंडा प्रभावित करने की महत्वपूर्ण क्षमता देती है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच SCO को अपने हितों के लिए प्रभावी मंच बनाए रखे।
इस समीकरण को और जटिल बनाता है चीन-पाकिस्तान संबंध। दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी लगातार गहरी हुई है। पाकिस्तान के SCO की अध्यक्षता संभालने के बाद भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि संगठन का मंच किसी एक देश के राजनीतिक एजेंडे का माध्यम न बन जाए।
भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दों में आतंकवाद शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने SCO सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसके खिलाफ दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए। हालांकि उन्होंने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को व्यापक रूप से पाकिस्तान की आतंकवाद संबंधी नीतियों पर संदेश के रूप में देखा गया।
भारत की दूसरी बड़ी प्राथमिकता कनेक्टिविटी है। मध्य एशिया तक भारत की सीधी जमीनी पहुंच सीमित है और पाकिस्तान के साथ संबंधों के कारण वैकल्पिक मार्गों का महत्व बढ़ जाता है। ऐसे में ईरान के चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती हैं।
भारत चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का समर्थन नहीं करता। इसका प्रमुख कारण चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC है, जिसका एक हिस्सा उस क्षेत्र से होकर गुजरता है जिस पर भारत अपना दावा करता है। इसलिए SCO के भीतर कनेक्टिविटी पर होने वाली चर्चा भारत के लिए आर्थिक अवसर के साथ-साथ संप्रभुता का भी सवाल है।
हालांकि बिश्केक सम्मेलन को केवल चीन की जीत या भारत की चुनौती के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। SCO में सदस्य देशों के हित एक-दूसरे से काफी अलग हैं। चीन और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत है, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत पश्चिमी देशों के साथ भी संबंध बनाए रखता है। विशेषज्ञों के अनुसार SCO को एक एकीकृत ‘एंटी-वेस्टर्न ब्लॉक’ मानना भी सही नहीं होगा।
भारत के लिए SCO की उपयोगिता इसलिए बनी हुई है क्योंकि यह उसे चीन, रूस, ईरान, मध्य एशिया और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ एक ही बहुपक्षीय मंच पर बातचीत का अवसर देता है। ऐसे मंच पर भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं के साथ-साथ ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और आतंकवाद विरोधी सहयोग के मुद्दे भी उठा सकता है।
बिश्केक सम्मेलन में भारत की कुछ प्राथमिकताओं को भी समर्थन मिला। आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई, SCO की संस्थागत क्षमता बढ़ाने और युवाओं, विज्ञान तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़े भारतीय प्रस्तावों को आगे बढ़ाया गया। भारत ने कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने की बात कही, लेकिन संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान को जरूरी शर्त बताया।
अब असली चुनौती इन घोषणाओं को जमीन पर उतारने की है। SCO में निर्णय अक्सर सर्वसम्मति से होते हैं और सदस्य देशों के बीच भारत-चीन सीमा विवाद तथा भारत-पाकिस्तान तनाव जैसे गंभीर मतभेद मौजूद हैं। इसलिए किसी साझा रणनीति को लागू करना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान की अध्यक्षता में भारत को बेहद संतुलित कूटनीति अपनानी होगी। एक तरफ उसे SCO के भीतर सक्रिय रहकर मध्य एशिया और अन्य सदस्य देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने होंगे, वहीं दूसरी तरफ चीन-पाकिस्तान की किसी ऐसी पहल का विरोध करना होगा जो भारत के रणनीतिक या संप्रभु हितों के खिलाफ हो।
भारत के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वह रूस और ईरान जैसे देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को SCO के मंच पर प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करे। साथ ही मध्य एशियाई देशों के साथ सीधे आर्थिक और रणनीतिक संबंध बढ़ाने से चीन के प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, बिश्केक SCO समिट भारत के लिए सिर्फ एक सम्मेलन नहीं बल्कि आने वाले समय की विदेश नीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव है। चीन का बढ़ता प्रभाव और पाकिस्तान की नई SCO अध्यक्षता भारत के सामने चुनौती जरूर पेश करती है, लेकिन संगठन में भारत की सक्रिय और स्वतंत्र कूटनीति के लिए पर्याप्त अवसर भी मौजूद हैं। आने वाले एक साल में यह देखना अहम होगा कि नई दिल्ली इन अवसरों को किस तरह अपने राष्ट्रीय हितों में बदलती है।



