
पूर्व वायुसैनिक ने बताया कि युद्ध के दौरान फाइटर जेट क्रैश होने पर पायलट अपनी जान बचाने के लिए कई सावधानियों और तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। सबसे पहला कदम होता है ईजेक्ट सीट का उपयोग, जिससे पायलट सुरक्षित रूप से जेट से बाहर निकल सकता है। इसके बाद पैराशूट की मदद से सुरक्षित उतराई सुनिश्चित की जाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि पायलटों को क्रैश के दौरान जहाज की दिशा, गति और हवा की स्थिति के अनुसार तुरंत निर्णय लेने का प्रशिक्षण दिया जाता है। आधुनिक फाइटर जेट में कई सुरक्षा तकनीकें लगी होती हैं, जैसे एंटी-फायर सिस्टम और इमरजेंसी ऑक्सीजन, जो पायलट की जान बचाने में मदद करती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रशिक्षण और तकनीकी सुरक्षा के सही मिश्रण से ही पायलट जटिल परिस्थितियों में भी सुरक्षित बच सकता है।
पूर्व वायुसैनिक ने यह भी बताया कि क्रैश के बाद पायलटों को तुरंत सुरक्षित क्षेत्र में जाने और बचाव दल के संपर्क में आने की प्रक्रिया अपनानी होती है। उन्हें आसपास के भू-भाग, मौसम और दुश्मन गतिविधियों का भी ध्यान रखना पड़ता है।
साथ ही, नियमित ड्रिल और सिमुलेशन प्रशिक्षण पायलटों को तनावपूर्ण परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा कि युद्ध या प्रशिक्षण के दौरान पायलटों की यह तत्परता और तकनीकी सुरक्षा मिलकर उनके जीवन की रक्षा करती है और मिशन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाती है।



