Pakistan Military Reform: असीम मुनीर बने सर्वेसर्वा, सेना के कमांड स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव

पाकिस्तान की सेना के कमांड स्ट्रक्चर में करीब 50 साल बाद बड़ा बदलाव हुआ है। देश ने पुराने Joint Chiefs of Staff आधारित समन्वय मॉडल को हटाकर अधिक केंद्रीकृत सैन्य कमांड व्यवस्था लागू की है। इस नई व्यवस्था के केंद्र में फील्ड मार्शल असीम मुनीर हैं, जो सेना प्रमुख के साथ-साथ Chief of Defence Forces (CDF) की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं।
इस बदलाव की शुरुआत नवंबर 2025 में हुए पाकिस्तान के 27वें संविधान संशोधन से हुई थी। इसके बाद अगस्त 2026 में संसद ने Defence Forces of Pakistan Act और National Command Authority Act में संशोधन को मंजूरी दी। इन कानूनों ने CDF के अधिकारों और नई सैन्य कमांड व्यवस्था को औपचारिक कानूनी आधार दिया है।
एक कमांडर के हाथ में तीनों सेनाओं की कमान
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब पाकिस्तान की सेना, नौसेना और वायुसेना के संचालन को एक केंद्रीय कमांड संरचना के तहत रखा गया है। असीम मुनीर सेना प्रमुख होने के साथ CDF भी हैं और सैन्य अभियानों के स्तर पर तीनों सेवाओं के बीच समन्वय और कमांड में उनकी भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गई है।
पहले Chairman Joint Chiefs of Staff Committee तीनों सेनाओं के बीच मुख्य रूप से समन्वय की भूमिका निभाते थे। उनके पास तीनों सेवाओं पर प्रत्यक्ष परिचालन कमांड नहीं था। नई व्यवस्था ने इस मॉडल को बदलकर अधिक एकीकृत कमांड चेन तैयार की है।
असीम मुनीर की ताकत क्यों बढ़ी?
असीम मुनीर को दिसंबर 2025 में पांच साल के लिए Chief of Defence Forces नियुक्त किया गया था और उन्होंने सेना प्रमुख का पद भी बरकरार रखा। इससे उनकी सैन्य भूमिका केवल थलसेना तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक रक्षा कमान तक फैल गई।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण असर उनके कार्यकाल पर भी पड़ा है। नए ढांचे के तहत उनका CDF कार्यकाल पांच साल का है, जिससे वह कम से कम 2030 तक पाकिस्तान की सैन्य कमान के शीर्ष पर बने रह सकते हैं।
पाकिस्तान ने क्यों बदला कमांड सिस्टम?
पाकिस्तान सरकार की दलील है कि आधुनिक युद्ध में अलग-अलग सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी हो गया है। आज के युद्ध में ड्रोन, साइबर वॉरफेयर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, मिसाइल और लंबी दूरी के सटीक हथियार एक साथ इस्तेमाल होते हैं। ऐसे में एकीकृत कमांड से निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज करने और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिल सकती है।
मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य संघर्ष के बाद इस जरूरत पर विशेष जोर दिया गया। पाकिस्तान में सैन्य एकीकरण को उस संघर्ष से मिले सबक के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
क्या भारत की बढ़ेगी टेंशन?
पाकिस्तान की नई सैन्य व्यवस्था का भारत के लिए सीधा मतलब यह है कि भविष्य के किसी सैन्य संकट में पाकिस्तान के तीनों सैन्य अंगों के बीच कमांड और समन्वय अधिक केंद्रीकृत हो सकता है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है।
भारत के लिए खास चिंता यह हो सकती है कि एक ही शीर्ष सैन्य अधिकारी के पास थल, वायु और नौसैनिक अभियानों की व्यापक कमांड भूमिका हो। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि पाकिस्तान की सैन्य क्षमता अचानक कई गुना बढ़ गई है। असली प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नई कमांड व्यवस्था व्यवहार में कितनी प्रभावी साबित होती है।
परमाणु कमांड भी अहम
इस बदलाव का एक संवेदनशील पहलू पाकिस्तान की रणनीतिक और परमाणु कमांड व्यवस्था से जुड़ा है। नई व्यवस्था में National Strategic Command के लिए भी नया ढांचा तैयार किया गया है। हालांकि पाकिस्तान की परमाणु नीति और हथियारों के इस्तेमाल से जुड़ा अंतिम अधिकार National Command Authority के पास ही बना हुआ है।
इसलिए भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए पाकिस्तान के नए सैन्य कमांड मॉडल पर नजर रखना महत्वपूर्ण है। खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला देश है और भारत के साथ उसका लंबे समय से रणनीतिक तनाव चला आ रहा है।
सेना का राजनीतिक प्रभाव भी सवालों में
पाकिस्तान में सेना का राजनीतिक प्रभाव पहले से ही बड़ा रहा है। ऐसे में आलोचकों को चिंता है कि सैन्य कमांड को एक व्यक्ति के नेतृत्व में अधिक केंद्रीकृत करने से देश के नागरिक-सैन्य संतुलन पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने इसे केवल सैन्य सुधार नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में भी देखा है।
समर्थकों का तर्क है कि एकीकृत कमांड आधुनिक युद्ध की जरूरत है और इससे सेना के तीनों अंगों के बीच तालमेल बेहतर होगा। वहीं आलोचकों का सवाल है कि इतनी बड़ी सैन्य शक्ति को एक ही शीर्ष अधिकारी के आसपास केंद्रित करने से संस्थागत निगरानी और नागरिक नियंत्रण कितने प्रभावी रहेंगे।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान का नया सैन्य कमांड स्ट्रक्चर केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं है। इससे असीम मुनीर की सैन्य भूमिका बेहद मजबूत हुई है, तीनों सेनाओं के लिए अधिक एकीकृत कमांड चेन बनी है और उनके कार्यकाल को भी लंबा आधार मिला है। भारत के नजरिए से यह बदलाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका वास्तविक रणनीतिक असर आने वाले समय में पाकिस्तान की सैन्य नीति और भारत के साथ उसके संबंधों में दिखाई देगा।



