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संडे वीकऑफ का इतिहास: कैसे तय हुआ रविवार की छुट्टी का नियम?

रविवार को वीकऑफ मिलना आज आम बात है, लेकिन इसके पीछे एक लंबा और दिलचस्प इतिहास छिपा हुआ है। दरअसल, रविवार की छुट्टी की परंपरा की जड़ें यूरोप के ईसाई समाज से जुड़ी मानी जाती हैं। ईसाई धर्म में रविवार को प्रार्थना और विश्राम का दिन माना जाता था, क्योंकि यह दिन प्रभु यीशु के पुनर्जीवन से जुड़ा है। चौथी शताब्दी में रोमन सम्राट Constantine the Great ने रविवार को आधिकारिक अवकाश घोषित किया था, जिससे यह परंपरा मजबूत हुई। इसके बाद यूरोप के कई देशों में रविवार को सरकारी और व्यावसायिक कामकाज बंद रखने की परंपरा बन गई।

भारत में रविवार की छुट्टी ब्रिटिश शासन के दौरान लागू हुई। औद्योगिक क्रांति के दौर में मजदूरों को सप्ताह में सातों दिन काम करना पड़ता था, जिससे असंतोष बढ़ने लगा। 19वीं सदी में सामाजिक सुधारकों और मजदूर नेताओं ने साप्ताहिक अवकाश की मांग उठाई। माना जाता है कि मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में श्रमिक नेता Narayan Meghaji Lokhande ने अंग्रेज हुकूमत से मजदूरों के लिए सप्ताह में एक दिन की छुट्टी की मांग की थी। लंबे संघर्ष के बाद 1890 के दशक में रविवार को साप्ताहिक अवकाश के रूप में मान्यता मिली।

धीरे-धीरे यह नियम पूरे देश में लागू हो गया और स्कूल, कॉलेज, दफ्तर व सरकारी संस्थान रविवार को बंद रहने लगे। हालांकि, भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग-अलग धर्मों के अपने विश्राम दिवस होते हैं—जैसे मुस्लिम समुदाय के लिए शुक्रवार और यहूदी धर्म में शनिवार—लेकिन प्रशासनिक सुविधा और ऐतिहासिक कारणों से रविवार को सार्वभौमिक वीकऑफ के रूप में स्वीकार किया गया।

आज के समय में भी कई निजी कंपनियां पांच दिन का वर्किंग वीक अपनाती हैं, लेकिन रविवार का अवकाश लगभग हर क्षेत्र में सामान्य है। इस तरह रविवार की छुट्टी केवल आराम का दिन नहीं, बल्कि इतिहास, धार्मिक परंपराओं और श्रमिक आंदोलनों के संघर्ष की एक विरासत भी है, जो आधुनिक कार्य संस्कृति का अहम हिस्सा बन चुकी है।

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